दिल दुखा कर, आजमा कर, या रुला कर छोड़ना,
हमने सिखा ही नहीं अपना बना कर छोड़ना।
ताकि दुनिया ये न समझे हम में दुरी हो गयी,
साथ जब भी छोड़ना तो मुस्कुरा कर छोड़ना।
हैं तरिक़े और भी मुझसे बिछड़ने के लिए,
क्या ज़रूरी है कोई तोहमत लगा कर छोड़ना।
होश बाक़ी रह गए तो जी नहीं पाउँगा मैं,
कुछ ना याद आये मुझे इतनी पिला कर छोड़ना।
तेल के बदले हमें चाहे लहूँ देना पड़े,
अपनी फ़ितरत है चिराग़ों को जला कर छोड़ना।
कुफ्र है एहसास-ए-मायूसी, थकन है बुजदिली,
हौसलों की डोर को मंजिल पर जा के छोड़ना।
.............राहुल श्रीवास्तव

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