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Saturday, 16 March 2013

इज़हार-ए-दिल ...








बहुत मुश्किल है सोचना कैसे इज़हार करूँ ,


वो तो एक खुशबू है कैसे गिरफ्तार करूँ ,

खुदा जाने मेरी किस्मत में वो है या नहीं ,

आरज़ू है आखिरी साँस तक उसका इंतजार करूँ , 

अगर वो हसीन मेहरबान हो जाए चाहत पर ,

सब भुला के मै सिर्फ उसे ही प्यार करूँ ,

हर आरज़ू पूरी नहीं होती ये मालूम है ,

मगर आरज़ू-ए-दिल से क्यूँ इंकार करूँ ,

दीदार हो काफी है मेरे मोहब्बत लिए ,

डर उनकी नाराजगी का है कैसे इकरार करूँ ,

वो चाहे न चाहे ये उसकी मर्ज़ी है ,

पर मै उसपे अपनी जान निसार करूँ ..............


.......................................राहुल श्रीवास्तव 


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